Friday, August 05, 2011

मन

कभी चंचल कभी सौम्य
कितने भाव बदलता है
कभी काला कभी निराला
कितने रंग बदलता है ये मन

कभी गहरा कभी सतही
कितने मर्म छुपाता है
कभी जिज्ञासू कभी शिथिल
कितनी गुत्थियाँ खोलता है ये मन

कभी आहत कभी हर्षित
कितने घाव भरता है
कभी अजेय कभी पराजित
कितने युद्ध लड़ता है ये मन

कभी दुपहरि कभी शाम
कितने दिन गिनता है
कभी पतंग कभी धरा पर
कितनी उड़ाने भरता है ये मन

कभी विह्वल कभी विभोर
कितनी अठखेलियाँ खेलता है
कभी सुरमयी कभी नीरस
कितनी कवितायें लिखता है ये मन